मिन्नत-ए-शान-ए-जहाँ
ऐ शान-ए-जहाँ अपनी शान तो रखिए,
जो वादा कर दिया है फिर ज़ुबान तो रखिए।
दिल मैंने रख दिया आपकी चाकू की नोंक पर,
आप अपनी ज़ुबाँ पर मेरा नाम तो रखिए।
घंटे भर से कर रहा हूँ आपकी मिन्नत,
मेरे घर तो आइए मेरा मान तो रखिए।
ऐसे ही कौन किसी को अपने घर बुलाता है,
मिठाई नहीं ना सही, मीठा पान तो रखिए।
कौन देखिए दुनिया में बीमार बचता है,
हर घड़ी अपने होठों पर ये मुस्कान तो रखिए।
माना आप नूर-ए-ख़ुदा हैं, मौसम-ए-बहरा हैं लेकिन,
पास “गुलशन” नहीं ना सही गुलदान तो रखिए।
Jan 2024©️
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