रु-ब-रु
जंज़ीरें तोड़ी हैं मैंने, एक डर की आहट से परे हुआ हूँ
रो लेने दो मुझे कि आज मैं खुद से रु-ब-रु हुआ हूँ।
खो गया था कल, मेरे आज की तनहाई में
एक धुंधली तस्वीर थी बस, यादों की परछाईं में
खुद को बदल पाना मेरी कोशिश ये नादान थी
भूलते जाना एक सच, एक दूसरे सच की जुबान थी
ना जाने था जाना कहाँ, रास्ते सब उलझे से थे
मैं और मेरा अनजान सफ़र, हम दोनों एक दूजे से थे
आज जाना है एक सच, जानकर सच से ही दूर हुआ हूँ
रो लेने दो मुझे कि आज मैं ख़ुद से रु ब रु हुआ हूँ।।
शायद चाहा था वक़्त ने उसके क़दमों के साथ चलूँ
उठती गिरती साँसों की धड़कनों की आहट सुनूँ
सपने थे पसंद, मैंने गहरी अंगड़ाइयाँ ली थीं
मैं भी कहीं था शायद, जाने क्यूँ आँखें फेर ली थीं
आज थामा है हाथ किसी ने, चाहत है ख़ुद को पा जाने की
पर इतनी ताक़त भी नहीं मुझमें उससे नज़रें मिला पाने की
ज़द्दोज़हद पे ख़तम, कश्मकश में शुरू हुआ हूँ
रो लेने दो मुझे कि आज मैं खुद से रु ब रु हुआ हूँ।।
अनजान भी मैं हूँ, परेशान भी मैं हूँ
ख़ुद को यूं संभलते पाकर हैरान भी मैं हूँ
उन ख़ूबसूरत लम्हों को चाहत है फ़िर जी लूँ मैं
उस दिलकश सफ़र में खोकर आँखें अपनी मूँद लूँ मैं
क्यूँ चाहते हो तुम जीत लूँ मैं अपनी कोशिशों को
ख़ुद से उठी, गहरी चली इन रंज़िशों को
ख़ुद को खोकर ख़ुद की ही आबरू हुआ हूँ
रो लेने दो मुझे कि आज मैं ख़ुद से रु ब रु हुआ हूँ।।।
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