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मिन्नत-ए-शान-ए-जहाँ

ऐ शान-ए-जहाँ अपनी शान तो रखिए, जो वादा कर दिया है फिर ज़ुबान तो रखिए। दिल मैंने रख दिया आपकी चाकू की नोंक पर, आप अपनी ज़ुबाँ पर मेरा नाम तो रखिए। घंटे भर से कर रहा हूँ  आपकी  मिन्नत, मेरे घर तो आइए मेरा मान तो रखिए। ऐसे ही कौन किसी को अपने घर बुलाता है, मिठाई नहीं ना सही, मीठा पान तो रखिए। कौन देखिए दुनिया में बीमार बचता है, हर घड़ी अपने होठों पर ये मुस्कान तो रखिए। माना आप नूर-ए-ख़ुदा हैं, मौसम-ए-बहरा हैं लेकिन,   पास “गुलशन” नहीं ना सही गुलदान तो रखिए।  Jan 2024©️ 

ये गली...

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ये गली तंग,संकरी और अँधेरी  जो काफी लम्बी लगने लगी है अब  जिसके दोनों तरफ बने हैं घर  छोटी नालियां हैं   सड़कों पे बह रही  फूलों के गमलों की जगह  उग आये हैं काँटे  कहीं-कहीं।  हाँ,उस गली में  काटते हैं मच्छर,  भौंकते रहते हैं कुत्ते कूड़ा भी गिरा देती हैं कुछ खिड़कियाँ  इधर-उधर, जहाँ-तहाँ  एक गन्दी-सी  महक बिखरी पड़ी है  यहाँ-वहाँ।  बहुत अजीब-सा लगता है यहाँ एक अजीब सूनापन  एक डरावना सन्नाटा  जैसे दब सी गयी हो जिन्दगी की चहल-पहल  इसकी कभी ना  टूटने वाली  ख़ामोशी की तह में।  लेकिन जाना तो है ही मुझे  उस पार, अपने घर  सब कुछ सहकर, सब कुछ झेलकर  आख़िरकार।  सच है, मैं बदल नहीं सकता  इस गली के रूप को, इसकी कड़वी सच्चाई को  लेकिन कुछ भी हो  छोड़ भी तो नहीं सकता इसे…  क्योंकि - जाना तो है ही मुझे  उस पार, अपने घर...

उलझन

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यूँ ही खड़ा रहा मैं जाने  कब तक समय की आहट से बेखबर, सच और सपनों के फ़र्क से अनजान  छिछले छोर पर इस इतराती-गहराती नदी के।  दिखता रहा है मुझे- मौसम का बदलना  समय का पिघलना  रूठने के लहज़े में जैसे  नदिया का निर्जल हो जाना। साथ  ही मेरे मोड़ पर, खड़ा रहा है ये अंश पेड़ का  मुझे फर्क न  पड़ा हो, पर इसने देखा है- मचलते वक़्त को, आसमान के बदलते रंग को  निर्जीव और नीरस रहा है कभी  सब पत्तियों से अलग होकर, सब कुछ खोकर ….  आज हवाएं फिर उलटी बही हैं, नदिया फिर  उफन पड़ी है   रूठी पत्तियां फिर वापस आयी हैं, खुशियाँ झिलमिलाई हैं  इसने एक बार फिर मुस्कुराना सीखा है...  फिर से जीना सीखा है  जैसे खो गयी है बेजानियत आज नर्म हवाओं में  जैसे जीने की या  जी-भर जी  लेने की तड़प से खुल कर ली हो साँस फिर इन फिजाओं में।  सब कुछ बदलता रहा- रह-रह कर  सिवाय मेरे और मेरे लम्बे इंतज़ार के।  उलझा रहा मैं अपनी ही उलझन में  सोचता रहा- ...

रु-ब-रु

​ जंज़ीरें तोड़ी हैं मैंने, एक डर की आहट से परे हुआ हूँ रो लेने दो मुझे कि आज मैं खुद से रु-ब-रु हुआ हूँ। खो गया था कल, मेरे आज की तनहाई में एक धुंधली तस्वीर थी बस, यादों की परछाईं में खुद को बदल पाना मेरी कोशिश ये नादान थी भूलते जाना एक सच, एक दूसरे सच की जुबान थी ना जाने था जाना कहाँ, रास्ते सब उलझे से थे मैं और मेरा अनजान सफ़र, हम दोनों एक दूजे से थे आज जाना है एक सच, जानकर सच से ही दूर हुआ हूँ रो लेने दो मुझे कि आज मैं ख़ुद से रु ब रु हुआ हूँ।। शायद चाहा था वक़्त ने उसके क़दमों के साथ चलूँ उठती गिरती साँसों की धड़कनों की आहट सुनूँ सपने थे पसंद, मैंने गहरी अंगड़ाइयाँ ली थीं मैं भी कहीं था शायद, जाने क्यूँ आँखें फेर ली थीं आज थामा है हाथ किसी ने, चाहत है ख़ुद को पा जाने की पर इतनी ताक़त भी नहीं मुझमें उससे नज़रें मिला पाने की ज़द्दोज़हद पे ख़तम, कश्मकश में शुरू हुआ हूँ रो लेने दो मुझे कि आज मैं खुद से रु ब रु हुआ हूँ।। अनजान भी मैं हूँ, परेशान भी मैं हूँ ख़ुद को यूं संभलते पाकर हैरान भी मैं हूँ उन ख़ूबसूरत लम्हों को चाहत है फ़िर जी लूँ मैं उस दिलकश सफ़...

एक सवाल...

तुम्हारी आँखों में है एक सवाल, एक गहरा और जायज़ सवाल  उमड़ता-घुमड़ता, उठता-गिरता  एक सवाल  कतरा रहा हूँ जिससे मैं बार-बार।  मेरी आँखों  में है एक डर, अज़ीब-सा  शायद कुछ ऐसा  जैसे  वे छुपी रह जाना चाहती हैं, इन पलकों के आगोश में  हमेशा-हमेशा। शायद तुम भी ये समझते हो, थोड़ा झिझकते हो  शायद यही वज़ह है कि सवाल होठों पर ही रुके हैं, जैसे लफ्ज़ अपनी सारी ताकत खो चुके हैं  तुम मेरी उलझन, मेरी घुटन  अनजाने ही बढ़ाते जा रहे हो,  मेरे अकेलेपन का दायरा यूँ फैलाते जा रहे हो  इस बात से बेखबर कि काफी हैं ये, मुझे तोड़ कर बिखेर देने को…  तो आज उठा लो, खुद को ऊपर इस एहसास से,  तोड़ दो ये हिचकियाँ, छोड़ दो ये झिझक  मत रुको  पूछ लो ये सवाल  एक बार आज आखिरकार  सिर्फ एक बार  उतर जाने दो मुझे मेरी गहराईयों की हद तक  देख लेने दो मुझे शक्ल  इस भयानक डर की  क्यूंकि फिर डरने को कुछ भी नहीं रह जाएगा, पूछने और जानने को  कुछ भी बा...