उलझन

यूँ ही खड़ा रहा मैं
जाने  कब तक
समय की आहट से बेखबर,
सच और सपनों के फ़र्क से अनजान 
छिछले छोर पर
इस इतराती-गहराती नदी के। 

दिखता रहा है मुझे-
मौसम का बदलना 
समय का पिघलना 
रूठने के लहज़े में जैसे 
नदिया का निर्जल हो जाना।
साथ  ही मेरे मोड़ पर,
खड़ा रहा है ये अंश पेड़ का 
मुझे फर्क न  पड़ा हो,
पर इसने देखा है-
मचलते वक़्त को, आसमान के बदलते रंग को 
निर्जीव और नीरस रहा है कभी 
सब पत्तियों से अलग होकर, सब कुछ खोकर …. 

आज हवाएं फिर उलटी बही हैं,
नदिया फिर  उफन पड़ी है  
रूठी पत्तियां फिर वापस आयी हैं,
खुशियाँ झिलमिलाई हैं 
इसने एक बार फिर मुस्कुराना सीखा है... 
फिर से जीना सीखा है 
जैसे खो गयी है बेजानियत आज नर्म हवाओं में 
जैसे जीने की या  जी-भर जी  लेने की तड़प से
खुल कर ली हो साँस फिर इन फिजाओं में। 

सब कुछ बदलता रहा-
रह-रह कर 
सिवाय मेरे और मेरे लम्बे इंतज़ार के। 

उलझा रहा मैं अपनी ही उलझन में 
सोचता रहा-
क्या जिया है इसने जिंदगी के हर पल को 
जिन्दादिली और ताजगी के साथ
या फिर 
बार-बार हार है ये 
निर्मम मौसम की मार से 
रोया है अपनी बेबसी पर
खींचा है मेरे  मन की  की गहरी  संवेदना को 
या बार-बार शर्मिंदा हुआ है अपने आप पर…. 

क्या है सच?
और  क्यों है इतना अंतर 
हम दोनों के बीच?

Comments

Popular posts from this blog

एक सवाल...

रु-ब-रु

ये गली...