एक सवाल...
तुम्हारी आँखों में है एक सवाल,
एक गहरा और जायज़ सवाल
उमड़ता-घुमड़ता, उठता-गिरता
एक सवाल
कतरा रहा हूँ जिससे मैं बार-बार।
मेरी आँखों में है एक डर, अज़ीब-सा
शायद कुछ ऐसा
जैसे वे छुपी रह जाना चाहती हैं,
इन पलकों के आगोश में
हमेशा-हमेशा।
शायद तुम भी ये समझते हो,
थोड़ा झिझकते हो
शायद यही वज़ह है
कि सवाल होठों पर ही रुके हैं,
जैसे लफ्ज़ अपनी सारी ताकत खो चुके हैं
तुम मेरी उलझन, मेरी घुटन
अनजाने ही बढ़ाते जा रहे हो,
मेरे अकेलेपन का दायरा यूँ फैलाते जा रहे हो
इस बात से बेखबर
कि काफी हैं ये,
मुझे तोड़ कर बिखेर देने को…
तो आज उठा लो,
खुद को ऊपर इस एहसास से,
तोड़ दो ये हिचकियाँ, छोड़ दो ये झिझक
मत रुको
पूछ लो ये सवाल
एक बार आज आखिरकार
सिर्फ एक बार
उतर जाने दो मुझे मेरी गहराईयों की हद तक
देख लेने दो मुझे शक्ल
इस भयानक डर की
क्यूंकि फिर डरने को कुछ भी नहीं रह जाएगा,
पूछने और जानने को
कुछ भी बाकी नहीं रह जाएगा।
मुझ पर बरसो, मुझ पर चिल्लाओ,
तुम्हें हक़ है, मुझसे आँखें चुराओ
कुछ भी करो, बस चुप ना रहो
क्यूंकि…
बाकी सब कुछ सह लेना
आसान है मेरे लिए
सब कुछ
सिवाय-
तुम्हारी इस गहरी ख़ामोशी के।
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