ये गली...
ये गली तंग,संकरी और अँधेरी जो काफी लम्बी लगने लगी है अब जिसके दोनों तरफ बने हैं घर छोटी नालियां हैं सड़कों पे बह रही फूलों के गमलों की जगह उग आये हैं काँटे कहीं-कहीं। हाँ,उस गली में काटते हैं मच्छर, भौंकते रहते हैं कुत्ते कूड़ा भी गिरा देती हैं कुछ खिड़कियाँ इधर-उधर, जहाँ-तहाँ एक गन्दी-सी महक बिखरी पड़ी है यहाँ-वहाँ। बहुत अजीब-सा लगता है यहाँ एक अजीब सूनापन एक डरावना सन्नाटा जैसे दब सी गयी हो जिन्दगी की चहल-पहल इसकी कभी ना टूटने वाली ख़ामोशी की तह में। लेकिन जाना तो है ही मुझे उस पार, अपने घर सब कुछ सहकर, सब कुछ झेलकर आख़िरकार। सच है, मैं बदल नहीं सकता इस गली के रूप को, इसकी कड़वी सच्चाई को लेकिन कुछ भी हो छोड़ भी तो नहीं सकता इसे… क्योंकि - जाना तो है ही मुझे उस पार, अपने घर...